International Journal of Advanced Research and Development

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International Journal of Advanced Research and Development
Vol. 2, Issue 3 (2017)

क्षेत्राीय दल बनाम राष्ट्रीय एकीकरण


प्रदीप कुमार

राष्ट्रीय एकता से तात्पर्य किसी राष्ट्र के सभी व्यक्तियों में हम की भैावना का होना है। जब किसी राष्ट्र के सभी व्यक्ति किसी भी आधर पर भावनात्मक एकता का अनुभव करते हैं एवं राष्ट्रहित के आगे अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक हितों का त्याग करते हैं तो यह कहा जाता है कि उस राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता है। राष्ट्रीय एकता किसी भी राष्ट्र का मुख्य तत्व होता है। बिना इसके राष्ट्र की कल्पना ही नहीं की जा सकती। राष्ट्रीय एकता के अभाव में कोई भी राष्ट्र बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकता। राष्ट्रीय एकता के लिए भावनात्मक एकता आवश्यक है। किसी भी राज्य की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता उसके लिए सर्वोपरि होती है। कोई भी राज्य यह सहन नहीं कर सकता कि उसकी अखण्डता का विनाश हो। राष्ट्रीय अखण्डता एकीकरण पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय एकीकरण राज्य की प्रथम आवश्यकता है। राज्य के विकास के लिए यह आवश्यक है कि राज्य के अन्दर रहने वाले विभिन्न लोगों में एकता की भावना हो यही भावना राष्ट्रीय एकीकरण का सार है। राष्ट्रीय एकीकरण की भावना द्वारा विभिन्न धर्मों, जातियों व भाषाओं के लोगों में परस्पर मेलजोल बढ़ाकर एकता का विकास किया जाना है। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डा0 राधकृष्णन के अनुसार, ‘राष्ट्रीय एकीकरण एक घर नहीं है जो चूने और ईंटों से बनाया जा सकता है। यह एक औद्योगिक योजना भी नहीं है जिस पर विशेषज्ञों द्वारा विचार किया जाए और रचनात्मक रुप दिया जाए। इसके विपरीत एकीकरण एक ऐसा विचार है जिसका विकास लोगों के दिलों में होता है।’ यह एक चेतना है जिसने जन साधरण को जागृत करना है। अतः राष्ट्रीय एकीकरण उस भावनात्मक तथा विचारात्मक एकता का नाम है जो सभी भारतवासियों को प्रांत, भाषा, जाति, मजहब, क्षेत्रा, नस्ल, वर्ग आदि की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर उन्हें एक सूत्रा में बांधती है और उन्हें इस राष्ट्र की सनातन परम्परा के अनुसार विविध्ता में एकता का साक्षात्कार कराती है। चूंकि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रा है तथा राजनीतिक दल लोकतंत्रा की रीढ़ होते हैं। राजनीतिक दल अपनी नीतियों, कार्यक्रमों द्वारा लोगों को जागरूक करते हैं तथा जटिल मुद्दों पर जनमत निर्माण का कार्य करते हैं। प्रायः भारत में आरम्भ से ही यह दृष्टिगोचर होता है कि क्षेत्राीय दल जो अपने-अपने राज्यों व क्षेत्रा में अच्छा प्रभाव रखते हैं अपनी संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो के कारण कभी-कभी अपनी नीतियों, कार्यक्रमों, विचारों से राष्ट्रीय एकीकरण की भावना के समक्ष संकट पैदा कर देते हैं।
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