International Journal of Advanced Research and Development

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ISSN: 2455-4030

Vol. 2, Issue 4 (2017)

लोकतंत्र का नारीवादी आख्यान

Author(s): डा0 नीतू शर्मा
Abstract: ’ठरती हुई हवा कभी इस पहाड़ पर कभी उस पहाड़ पर, कभी चीड़-देवदार की इन पाँतों पर कभी उन पाँतों पर बर्फ के क्रिस्टल जैसे चूरों के साथ जब-तब झर रही है, जैसे भटके को ठौर की तलाश हो।’ xx फ्रांस के राष्ट्रपति शारद दी गाॅल की राशि चाहे जो रही हो पर 68 उनके लिए कशमकश भरा तूफान लेकर आया। सोर्नवार्न युनिवर्सिटी के छात्र-छात्रा लैटिन क्वार्टर की सड़कों पर सदियों से जमे काले पत्थरों को उखाड़ रहे थे और नारा लगा रहे थे - वे पुराने रीति-रिवाज नही चलने देगें। उन्हें आजादी चाहिए - लड़कियाॅ लड़कों के हाॅस्टल में और लड़के लड़कियों के हाॅस्टल में जब चाहे आ-जा सकते हैं और वे आपसी सहमति से सेक्स कर सकते हैं। दे वांट सेक्स फ्रीडम! फ्रीडम! फ्रीडम! दे वांट फ्रीडम! सेक्स फ्रीडम! (पृ0 27) xx शीलभंग के प्रति पुराने जमाने का ही आकर्षण विद्यमान था। लड़कियाॅ भी उतना ही मर्दानेपन के साथ इस मधुमासी यज्ञ को अंजाम देने लगी थीं। (111)
Pages: 413-415  |  552 Views  166 Downloads
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