International Journal of Advanced Research and Development

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ISSN: 2455-4030

Vol. 3, Issue 1 (2018)

राष्ट्रीय आन्दोलन में बालगंगाधर तिलक की भूमिका

Author(s): Dr. Sanjeet
Abstract: वस्तुतः बाल गंगाधर तिलक का सार्वजनिक जीवन 1880 में शैक्षणिक क्षेत्र से प्रारम्भ होता है। तिलक का विचार था कि अंग्रेजी शिक्षा उनसे पूर्व दो पीढ़ियों की मानसिक गुलामी के लिए उत्तरदायी है। पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त भारतीय ब्रिटिश शासन को एक ईश्वरीय देने समझते थे तथा हिन्दुत्व को हेय दृष्टि से देखते थे। इस समय ईसाई मिशनरियों के हाथों में पूना की शिक्षण संस्थाएं थीं और यद्यपि उनको धर्म परिवर्तन के उद्देश्य में अधिक सपफलता नहीं मिली थी लेकिन जनता में इनके विरूद्ध रोष था। चूंकि भारतीय इतिहास में 1900 से 1906 तक का समय अव्यवस्था लिए हुए था। उस समय एक ओर तो आन्तरिक और बाह्य घटनाओं, परिस्थितियों तथा शक्तियों के परिणामस्वरूप भारतीय जनता में नई राष्ट्रीय चेतना का विकास हो रहा था और दूसरी ओर सरकार अधिकाधिक शोषण, दमन तथा शक्ति-प्रदर्शन का मार्ग अपना रही थी। अतएवः भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ जो उदारवादियों की विचारधारा, लक्ष्य तथा साधनों में अविश्वास रखता था। यह वर्ग जिसे ‘उग्रवादी’ कहा जाता है जो राजशक्ति के बन्धनों में बंधा हुआ नहीं था तथा भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए कांग्रेस को जन आन्दोलन करने के लिए बाध्य करना चाहता था। प्रस्तुत शोध पत्र में राष्ट्रीय आन्दोलन में तिलक के योगदान का मूल्यांकन किया गया है।
Pages: 615-617  |  649 Views  159 Downloads
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