International Journal of Advanced Research and Development

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ISSN: 2455-4030

Vol. 3, Issue 2 (2018)

दार्शनिक प्रेम एवं उसका विश्लेषण

Author(s): ममता रानी
Abstract:
मानव मन में सत् असत् दोनों प्रकार के भाव विधमान है। सत् भाव मानव मन का उत्रयन करते है और असत् भाव उसका उपनयन करते हैं। सत् भावों से मानव जीवन में विकास होता है और असत् भावों में मानव जीवन संकुचित होकर दुःखों का कारण बनता है प्रेम सत् भावों में से एक प्रमुख भाव हैं, यह ह्नदय की यह रागात्मिक वृत्ति है जो मानव ह्नदय को मनुष्य, प्रकृति, जीवन और सम्पूर्ण चराचर सŸाा से जोड़ती है। यह मानव मन को तृप्ति प्रदान करने वाली वृत्ति है। यह वृत्ति लौकिक जगत् ही नहीं आध्यात्मिक जगत् में भी अपनी विशेष भूतिका रखती है। प्रेम के महत्व के स्वरूप प्रतिपादन करते है हुए महर्षि नारद ने लिखा है
अनिवचर्नीय प्रेम स्वरूपन।
गुण रहितकाम नारहित।
प्रतिक्षणवद्धमानम विच्छित्रसुभ्यतरमनुभवरूपन।
Pages: 1073-1074  |  336 Views  96 Downloads
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