International Journal of Advanced Research and Development

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International Journal of Advanced Research and Development
Vol. 3, Issue 6 (2018)

लक्ष्मीकान्त वर्मा : साहित्य की अन्य विधाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन


अर्चना मिश्रा

लक्ष्मीकान्त वर्मा ने कविता के लिए सौन्दर्यात्मक संतृप्ति की बात कही है। उनका कथन है कि - मेरा मतलब है कि वह सौन्दर्यात्मक संतृप्ति मिलनी चाहिए जो कविता के लिए वांछनीय है। शब्दों में अर्थों की व्यंजनायें गूँजे। पदों में समासों, बिम्बों और बिम्बों की प्रतिछायें एक के अनेकतर संदर्भों को उद्घाटित करे और सबसे बड़ी बात यह हो कि सत्य न तो निरामिश हो और न ही इतना अधिक झागदार हो कि असत्य लगने लगे। यह काम बड़ी साधना का है।
आज का जीवन जितना विषम है कविता भी उतनी ही विषम होगी। जो लोग इसमें वह तराश या खराश ढूँढ़ेगें या जो इसमें रंगीन तस्वीरें ही ढूँढ़ना चाहेंगी वह जरूर निराश होंगे क्योंकि साहित्य आदमी लिखता है और आदमी वही होता है जो समाज, परिवेश और वातावरण को झेलता है। इस झेलने के साथ यदि कविता निकलेगी तो उसमें खराश होगी और अगर खराश होगी तो खुर्दुरी होगी, कहीं-कहीं सपाट होगी और कहीं बेबाक भी होगी। मैं इसमें कोई दोष नहीं मानता लेकिन कलाकार के नाते यह जरूर चाहता हूँ कि जो भी खराश कविता में हो वह सिर्फ खराश ही न हो कुछ और भी हो यानी खराश के साथ ढंग हो और यह पता चले कि आप उस खराश को किस रूप में ले रहे हैं और उसका आप इस्तेमाल कर रहे हैं या वह आपके चेहरे पर दाग की तरह है, जख्म या नासूर की तरह है।
Pages : 81-83