International Journal of Advanced Research and Development


ISSN: 2455-4030

Vol. 4, Issue 1 (2019)

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005: एक आलोचनात्मक अध्धयन

Author(s): Dr. Hemant Kumar
Abstract: लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में शासन करने की वास्तविक शक्ति जनता के हाथों में होती है | लोकतन्त्र में देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधि को शासन करने का अवसर प्रदान करती है | साथ ही उनसे यह अपेक्षा करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी व कर्तव्य निष्ठा के साथ अपने दायित्वों का पालन करेगी | परन्तु कालान्तर मे अधिकांश राष्ट्रों ने अपने दायित्वों का निर्वाह ईमानदारी से नहीं किया | उन्होने पारदर्शिता व ईमानदारी की बोटियाँ नोंचने मे कोई कसर नहीं छोड़ी| उन्हें जब –जब अवसर प्राप्त हुआ, उन्होने तब – तब उसे गंवाना उचित नहीं समझा | उन्होने हर वो कार्य किया जो जन विरोधी व आलोकतांत्रिक था | देश का प्रत्येक नागरिक किसी न किसी रूप मे सरकार को टैक्स अदा करता है | यही टैक्स देश के विकास व व्यवस्था की आधारशिला है | इसलिए जनता को यह जानने का हक है की वह पैसा कब, कहाँ, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है | इसके लिए यह आवश्यक था कि सूचना को जनता के समक्ष रखने एवं उसे प्राप्त करने का अधिकार जनता को प्रदान किया जाए, जो कि एक कानून द्वारा ही संभव था | 1992 मे विश्व बैंक ने “प्रशासन और विकास”नामक एक दस्तावेज़ जारी किया | उस दस्तावेज़ ने अच्छे शासन के लिए 7 महत्वपूर्ण तत्वों का उल्लेख किया, जिसमे एक “सूचना और पारदर्शिता” का अधिकार भी था | अत: इन सभी को आधार बनाकर 15 जून 2005 मे “सूचना का अधिकार” निर्मित किया गया | इस अधिकार का मुख्य उद्देश्य था कि सभी सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं के निर्णय, संचालन व सबंधित सभी फाइल व दस्तावेजों की जानकारी जनता को उचित रूप से व कम से कम फीस पर प्राप्त हो सके | एक शोध दृष्टिकोण से इस लेख का उद्देश्य संवैधानिक तर्क को स्पष्ट करना है | “सूचना का अधिकार” जिसमे मुख्यत: दो विशिष्ट सिद्धान्त होते है, प्रथम खुलापन और पारदर्शिता तथा दूसरा गुप्तता | सही मायनों मे इस अधिकार का मुख्य प्रयोजन सरकारी दस्तावेजों तक आम जनमानस की पहुँच बनाना है |
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