International Journal of Advanced Research and Development


ISSN: 2455-4030

Vol. 4, Issue 3 (2019)

मध्यकालीन संत साहित्य की सांस्कृतिक चेतना का अध्ययन

Author(s): सरिता देवी
Abstract: वातावरण, वैयक्तिक परिस्थितियाँ, भौतिक साधन व्यक्ति और समाज की सांस्कृतिक चेतना को स्वरूप देते रहे हैं। प्रकृति की सीमाओं में मनुष्य ने जो विजय चाही उसका भौतिक स्वरूप, सभ्यता और आत्मिक, अध्यात्मिक अथवा मानसिक स्वरूप संस्कृति है। सभ्यता बाह्य प्रकृति पर हमारी विजय गर्व ध्वज है और संस्कृति अन्तः प्रकृति और विजय प्राप्ति की सिद्ध सामाजिक संस्थान, आर्थिक प्रेरण प्रक्रिया और भौगोलिक स्थिति की भूमिका मानसिक घात-प्रतिघात, क्रिया-प्रक्रिया और ज्ञानात्मक विकास होते हैं। सांस्कृतिक चेतना कई भूमिकाओं, समष्टिगत परिणाम और जीवन की इकाई पूर्ण पे्ररणा है। संस्कृति वह संगम है, जो जीवन की संगति और सामंजस्यपूर्ण सतत् प्रवहमान चीर-चैतन्य धारा की इकाई है। सामाजिक भूमिका में मानवार्जित क्षमता का एवं ज्ञान आस्था, कला, नैतिकता, कानून, रीति-नीति को स्वरूप देती है। जीवन की भौतिक प्रणाली आध्यात्मिक प्रेरणा को स्वरूप देती है और आध्यात्मिक सांस्कृतिक चेतना भौतिकता का अनुशासन है। नाना प्रकार की धर्म-साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नें और सेवा-भक्ति अथवा योग मूलक अनुभूतियों में जीवन का सत्य ही व्यापक और परिपूर्ण रूप प्राप्त करता रहा है। जन्म जात संस्कार, भौतिक प्रणाली, सांस्कृतिक चेतना की भूमिका में जीवन अनुप्राणित, नियन्त्रित और अनुशासित होता रहा है।
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