International Journal of Advanced Research and Development

International Journal of Advanced Research and Development


International Journal of Advanced Research and Development
International Journal of Advanced Research and Development
Vol. 4, Issue 3 (2019)

नवगीत : मूल्य परिवर्तन की अवधारण व दिशाएँ


मनीष कुमार तिवारी, डाॅ0 उर्मिला वर्मा

किसी वस्तु में मूल्यों की अवधारणा का आधार उस वस्तु के प्रति लोकमत की रूचि तथा आकर्षण होता है। जब एक से अधिक व्यक्ति होते हैं और ऐसा होना सामाजिक जीवन का अनिवार्य लक्षण भी है। तब वहाँ पर अन्तक्र्रिया प्रारम्भ होती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार में रूचिभेद से परिचित होता है। फलस्वरूप दूसरा व्यक्ति उसकी रूचियों का आदर करे इस भाव से प्रेरित होकर वह दूसरों की रूचियों एवं हितों का आदर तथा संरक्षण करेगा। पारस्परिक हित संरक्षण की यह अन्योन्याश्रितता, मूल्यों के प्रादुर्भाव और उनकी परम्परा तथा प्रगति का कारण बन जाती है। भारतीय समाजशास्त्री प्रो. राधाकमल मुखर्जी यह मानते हैं कि मूल्य, समाज द्वारा स्वीकृत इच्छाओं एवं लक्ष्यों का नाम है। समाज जिस वस्तु या विचार को उचित एवं युक्ति संगत समझता है वही ‘मूल्य’ बन जाता है। इस प्रकार सभी प्रकार के मानवीय सम्बन्धों में बाधक भाव को स्थापित करने वाला तत्व मूल्य माना जायेगा। विभिन्न संस्कृतियों की एकता एवं स्थायित्व में तथा संस्थाओं के ज्ञातव्य एवं उनकी एक रूपता के मूल में ही विद्यमान रहते हैं। मूल्य सामाजिक सम्बन्धों तथा व्यवहारों में प्रशासन की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
Pages : 27-29 | 452 Views | 106 Downloads