International Journal of Advanced Research and Development

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International Journal of Advanced Research and Development
International Journal of Advanced Research and Development
Vol. 2, Issue 5 (2017)

अध्यात्म रामायण में स्वयंप्रभा का तप


डाॅ0 वेद प्रकाश मिश्र, श्रीमती उमा सिंह चंदेल

प्रस्तुत शोधपत्र में अध्यात्मरामायण में वर्णित गन्धर्वपुत्री स्वयंप्रभा के तप का विवरण प्रस्तुत किया है। अध्यात्मरामायण के किष्किन्धा काण्ड के छठवें सर्ग में स्वयंप्रभा का वर्णन है। स्वयंप्रभा दिव्य नामक गंधर्व की पुत्री थी। स्वयंप्रभा दानवों के विश्वकर्मा मयदानव की पुत्री हेमा की सखी थी। वह श्रीहरि विष्णु की उपासना कर मोक्ष चाहती थी, जो हमेशा श्रीविष्णु की पूजा उपासना तथा तप में लीन रहा करती थी। स्वयंप्रभा की दिव्यरूपिणी सखी हेमा ने अपने नृत्य से महादेव को प्रसन्न किया था। पूर्वकाल में जब हेमा ब्रह्मलोक जाने लगी, तब उसने स्वयंप्रभा से कहा - तुम प्राणियों से रहित इसी महल में तप करो। त्रेतायुग में साक्षात् नारायण राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेंगे तथा पृथ्वी का भार उतारने हेतु वन में विचरेंगे। हेमा ने ही स्वयंप्रभा से कहा था कि राम की भार्या को कुछ वानर खोजते हुए इसी गुफा में आयेंगे उनके द्वारा ही तुम्हारा श्रीराम का साक्षत दर्शन होगा जिसके बाद तुम मोक्ष को प्राप्त कर लोगी। अपनी सखी हेमा के कहने पर ही स्वयंप्रभा श्रीराम दर्शन एवं मोक्ष की आकांक्षा से हजारो वर्ष तप किया और अंत में श्रीराम का दर्शन कर परम धाम को चली गयी।
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How to cite this article:
डाॅ0 वेद प्रकाश मिश्र, श्रीमती उमा सिंह चंदेल. अध्यात्म रामायण में स्वयंप्रभा का तप. International Journal of Advanced Research and Development, Volume 2, Issue 5, 2017, Pages 900-902
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