International Journal of Advanced Research and Development

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International Journal of Advanced Research and Development
International Journal of Advanced Research and Development
Vol. 3, Issue 1 (2018)

मिथक अवधारणा स्वरूप और विकास


डाॅ0 सीमा जैन

मिथक की व्युत्पत्ति अनेक प्रकार से मानी गई है। जिनमें मिथ, माइथाॅस या मिथस् को आधार माना गया है। विभिन्न विद्वानों ने मिथक की विभिन्न परिभाषाएँ दी है। वस्तुतः मिथक पुरातन को नवीन परिप्रेक्ष्य में रखते हुए सत्य की प्रतिष्ठा करता है। मिथक के अनेक प्रकार प्राकृतिक, ऋतु परिवर्तन संबंधी, देवत्व संबंधी, प्राणीजन्य संबंधी इत्यादि माने गए है। मिथक दंतकथाओं, लोककथाओं और इतिहास आदि से संबंध रखते हुए भी भिन्न होता है। यह प्रतीकों पर आश्रित होता है किन्तु स्वयं प्रतीक नहीं होता है। मिथक की साहित्य एवं समाज में अत्यन्त उपयोगिता है। लेखक युगीन समस्याओं को और अनेक जीवन प्रसंगों को इसके माध्यम से चित्रित करता है।
Download  |  Pages : 799-800
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डाॅ0 सीमा जैन. मिथक अवधारणा स्वरूप और विकास. International Journal of Advanced Research and Development, Volume 3, Issue 1, 2018, Pages 799-800
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